दुर्गा नहीं महिषासुर की जय

दाहरू असुर का परिवार
इमेज कैप्शन, असुर जनजाति के लोग ख़ुद को महिषासुर का वंशज मानते हैं
    • Author, पीएम तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
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पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा को लोकउत्सव का दर्जा हासिल है लेकिन वहीं एक गांव ऐसा है जहां इस समय मातम मनता है.

इस राज्य के उत्तरी इलाके में जलपाईगुड़ी ज़िले में स्थित अलीपुरदुआर के पास माझेरडाबरी चाय बागान में रहने वाली एक जनजाति के लोग दुर्गापूजा के दौरान मातम मनाते हैं. इस दौरान वे न तो नए कपड़े पहनते हैं और न ही घरों से बाहर निकलते हैं.

इस जनजाति का नाम है असुर और यह लोग बागान की असुर लाइन यानी इस जनजाति के मज़दूरों के लिए बनी कॉलोनी में रहते हैं.

इस जनजाति के लोग खुद को महीषासुर के वंशज मानते हैं.

उनमें इस बात का गुस्सा है कि दुर्गा ने ही महिषासुर को मारा था. इसी वजह से पूरा राज्य जब खुशियां मनाने में डूबा होता है तब ये लोग मातम मनाते रहते हैं.

इस जनजाति के बच्चे मिट्टी से बने शेर के खिलौनों से खेलते तो हैं, लेकिन उनमें से किसी के कंधे पर सिर नहीं होता. बच्चे शेरों की गर्दन मरोड़ देते हैं. यह दुर्गा की सवारी जो है.

सात साल का आनंद असुर ऐसा ही एक खिलौना दिखाते हुए कहता है, "मैं एक असुर हूं. शेरों से मुझे सख्त नफरत है. इसलिए पहले दिन ही मैंने इसकी गर्दन मरोड़ दी."

असुर जनजाति के लोग उत्तर बंगाल के कुछ और चाय बागानों में रहते हैं. 100 साल से भी पहले चाय बागानों के ब्रिटिश मालिक इनको छोटा नागपुर इलाक़े से यहां ले आए थे.

परंपरा का पालन

यहां असुर लाइन में रहने वाले 26 परिवारों में लगभग 150 सदस्य हैं. इन सबको अपने पूर्वजों से सुनी उस कहानी पर पूरा भरोसा है कि महिषासुर को मारने के लिए तमाम देवी-देवताओं ने अवैध तरीके से हाथ मिला लिए थे.

इस जनजाति के लोग पूजा के दौरान अपने तमाम काम रात में निपटाते हैं. दिन में तो वे बाहर क़दम तक नहीं रखते.

दहारू असुर कहते हैं, "महिषासुर दोनों लोकों यानी स्वर्ग और पृथ्वी पर सबसे ज्यादा ताकतवर थे. देवताओं को लगता था कि अगर महिषासुर लंबे समय तक जीवित रहा तो लोग देवताओं की पूजा करना छोड़ देंगे. इसलिए उन सबसे मिल कर धोखे से उसे मार डाला."

वह कहते हैं "महिषासुर के मारे जाने के बाद ही हमारे पूर्वजों ने देवताओं की पूजा बंद कर दी थी. हम अब भी उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं."

असुर साल में एक दिन हड़िया यानी चावल से बनी कच्ची शराब और मुर्गे का मांस चढ़ा कर अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं.

असुर लाइन से आज तक किसी ने स्कूल का मुंह तक नहीं देखा है इस जनजाति के बच्चों के लिए सच वही है जो उन्होंने अपने पिता और दादा से सुना है. इन लोगों के खाने-पीने की आदतें भी आम लोगों से अलग हैं.

उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय में एंथ्रोपोलॉजिस्ट समर विश्ववास कहते हैं, "ये लोग मूल रूप से झारखंड के चाईबासा और उड़ीसा के रहने वाले हैं. लेकिन उनका रहन-सहन काफ़ी अलग है. इन जनजातियों ने अपने पूर्वजों से जो कुछ सुना है उसे वे आज भी मानते हैं."