इमरजेंसी पर मुशर्रफ़ को नोटिस

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ से कहा है कि वे नवंबर 2007 में देश में इमरजेंसी लगाने के अपने फ़ैसले पर स्पष्टीकरण दें.
मुशर्रफ़ को अदालत में कई घंटे की चर्चा के बाद नोटिस दिया गया है. चर्चा इस मुद्दे पर हो रही थी कि उस लिए गए फ़ैसलों को चुनौती देने के मामले पर के बारे में मुशर्रफ़ से सवाल-जवाब कितना उचित है.
तीन नवंबर 2007 को मुशर्रफ़ ने आपातकाल की घोषणा तब की थी जब उन्हें ख़ासी राजनीतिक चुनौती मिल रही थी. इसके तहत संविधान को निलंबित कर दिया था और 60 जजों को बर्ख़ास्त किया गया था.
यदि उस समय के राष्ट्रपति के इस आदेश को अवैध ठहराया जाता है तो 60 बर्ख़ास्त जजों की जगह नियुक्त किए गए जजों को नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा.
उस समय नियुक्त किए गए जजों को एक अंतरिम संविधान आदेश के तहत शपथ लेने को कहा गया था.
ये पूरा मुद्दा एक याचिका की सुनवाई के दौरान उठा है जिसमें इस अंतरिम संविधान आदेश को चुनौती दी गई है और प्रार्थना की गई है जिन जजों ने इस आदेश के तहत शपथ उठाई उनके आगे काम करने पर रोक लगाई जाए.
पूरे मामले पर चर्चा के दौरान आदालत का मत था कि यदि किसी के कामकाज या गतिविधियों पर चर्चा हो रही है तो उसे भी अपना पक्ष रखने का हक़ होना चाहिए.
बीबीसी के इस्लामाबाद संवाददाता इलियास ख़ान का कहना है, "अदालत ने मुशर्रफ़ को आदेश तब दिया जब मंगलवार को सरकार का पक्ष रखते समय एटॉर्नी जनरल ने उस समय राष्ट्रपति रहे परवेज़ मुशर्रफ़ का पक्ष रखने या उनका इस मामले में बचाव करने से इनकार कर दिया."
लेकिन परवेज़ मुशर्रफ़ के पूर्व क़ानूनी सहायक मलिक क़य्यूम ने मीडिया को बताया कि वे इस मामले में मुशर्रफ़ का प्रतिनिधित्व करने पर विचार करेंगे.
पर्यवेक्षकों का कहना है कि ये नोटिस पाकिस्तानी राजनीति में बहुत ही नाज़ुक समय पर आया है क्योंकि पाकिस्तान पर अफ़ग़ानिस्तान से सटी उसकी सीमा पर तालेबान और अल क़ायदा का साफ़ाया करने का ख़ासा अमरीकी दबाव है.
मुशर्रफ़ इस समय विदेश में लेक्चर दौरे पर हैं. इस मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 14 सदस्यों की खंडपीठ बनाई है.


























