मौजूदगी दर्ज कराने की जद्दोजहद

अफ़ग़ानिस्तान में राष्ट्रपति पद के चुनावों की चर्चा हर ओर है. देश के सभी बड़े शहर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के पोस्टरों से भरे पड़े हैं.
इन उम्मीदवारों की तस्वीरों के बीच दो महिलाओं की तस्वीरें भी देखी जा रही हैं. वो भी एक ऐसे देश में जहाँ जीवन के हर मोड़ पर इस्लाम और परंपरा का दख़ल बहुत ही ज़्यादा है. कुछ लोग इन तस्वीरों को इस्लाम के ख़िलाफ़ एक अपराध समझते हैं.
राष्ट्रपति पद के मुक़ाबले में दो महिला उम्मीदवार हैं, जबकि प्रांतीय परिषद के चुनावों में तीन हज़ार से अधिक उम्मीदवारों में से 328 महिलाएँ हैं.
राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार फ़रोज़ाँ फ़ना का कहना है कि अगर वो चुनी जाती हैं तो वो चाहेंगी कि महिलाओं के लिए अधिक से अधिक नौकरियाँ मुहैया कराई जाएँ.
उन्होंने कट्टरपंथियों के उन इल्ज़ामों से भी अपना बचाव किया है जिनमें कहा गया है कि चुनाव प्रचार के लिए महिला उम्मीदवारों को अपनी तस्वीरों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.
उपेक्षित
राष्ट्रपति पद की एक अन्य उम्मीदवार शहला अता हैं, जिन्होंने ख़ुद को महिला अधिकारों के समर्थक के रूप में पेश किया है. उनका चुनावी नारा है, 'महिलाएँ समाज का आधा हिस्सा हैं'.
शहला अता का कहना, “मैं देश की उपेक्षित 50 प्रतिशत आबादी के जीवन स्तर को बेतहर बनाने के लिए जल्द से जल्द काम शुरू करना चाहती हूँ.”
लेकिन महिला उम्मीदवारों के लिए सफ़र आसान नहीं है. इनका कहना है कि इन्हें चुनाव प्रचार के दौरान कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
इनके पोस्टर फाड़ दिए जाते हैं, इन्हें अपशब्द सुनने पड़ते हैं, और इन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर डर है. और ये कठिनाई इन्हें सिर्फ़ महिला होने की वजह से झेलनी पड़ रही है.
इन्होंने बीबीसी को बताया कि अफ़ग़ान समाज में चुनाव प्रचार करना ख़ुद के लिए और इनके साथियों के लिए ख़तरनाक है.
पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान के कुनार प्रांत से काउंसिल की उम्मीदवार तूरपीकाई रसूली का कहना है, “मैं ग़रीब जनता की मदद और अपनी बहन के अधिकारों के लिए लडा़ई लड़ना चाहती हूँ. मेरा इलाक़ा पहाड़ी क्षेत्र की वजह से अलग-थलग है और महिलाओं को घर से लेकर स्वास्थ्य के मामलों में बहुत ज़्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता है.”
युद्ध में विधवा

तूरपीकाई रसूली ने पिछले चुनावों में जीत दर्ज की थी और इस बार फिर मैदान में हैं. चुनाव प्रचार की तमाम चुनौतियों के बाद भी उनकी प्रतिबद्धता का़यम है.
एक अन्य महिला ने भी काबुल से प्रांतीय परिषद के लिए अपना नामांकन भरा है. वो कहती हैं कि उनका मुख्य लक्ष्य लडा़ई के दौरान विधवा हुई महिलाओं को काम दिलाना है.
पिछले 30 साल के युद्ध में अफ़ग़निस्तान में बड़ी संख्या में महिलाओं ने अपने पति को खोया और फिर उनके ही कंधे पर अपने बच्चों के पालने की ज़िम्मेदारी आ गई.
अनेक महिलाओं ने चुनाव लड़ने की अपनी ख़्वाहिश ज़ाहिर की, लेकिन उन्हें इसकी इजाज़त नहीं दी गई. उनके पिता या पति ने ऐसा करने से मना कर दिया और उनका तर्क था कि ये ‘महिलाओं के लिए उपयु्क्त नहीं है’.
मुख्य रूप से मर्दों का कहना है कि जनता के बीच महिलाओं की तस्वीरों को दिखाना अफ़ग़ानिस्तान की संस्कृति और परंपरा के ख़िलाफ़ है.
काबुल के रहने वाले असदुल्लाह का कहना है, “मेरी राय में महिलाओं की तस्वीरें दीवारों पर हर जगह चिपकाना सही नहीं है, क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान एक मुस्लिम देश है. हम लोगों के लिए ये सम्मान का मामला है.” दूसरे भी उनकी राय से सहमत दिखते हैं.
बेहतर भविष्य

एक व्यक्ति का कहना है, “इस्लाम में महिला शासन नहीं कर सकती. लेकिन वो शुरा में भाग ले सकती हैं. जहाँ तक उनके पोस्टर का सवाल है, मैं कहना चाहता हूँ कि ये हमारे लिए शर्म की बात है. मैं एक मुसलमान हूँ, एक अफ़ग़ान हूँ और मेरी तहज़ीब इस बात को क़बूल नहीं करती.”
हालाँकि कुछ पुरुष ऐसे भी हैं जो समझते हैं कि महिला और पुरुष को वोट देने, चुनने और चुनाव प्रचार करने का समान अधिकार हैं.
काबुल के मोहम्मद जान का कहना है, “मैं समझता हूँ कि ये एक अच्छी बात है. मेरे लिए महिलाएँ मेरी माँ और बहन जैसी हैं जो बेहतर भविष्य के लिए काम करना चाहती हैं.”
जान कहते हैं कि उनकी राय में महिलाओं को पूरा अधिकार है कि चुनाव प्रचार के लिए देश में जहाँ चाहे अपनी तस्वीरें लगा लकती हैं.
एक अफ़ग़ान युवती स्तोराई तर्क देती हैं कि जिन औरतों ने चुनाव प्रचार के लिए अपनी तस्वीरें दीवारों पर लगाई हैं उन्होंने इस्लाम के अनुसार ही काम किया है.


























